असम में तब्लीगी जमात के तब्लीगियों की मस्जिद में एंट्री नहीं
मरकज कांड के बाद मूल असमिया मुसलमान तब्लीग जमात से न केवल आक्रोशित है बल्कि इससे जुड़े लोगों से दूरी बनाने लगा है। यही कारण है कि असम के कई इलाकों की मस्जिदों में इससे जुड़े लोगों के प्रवेश को प्रतिबंधित किया गया है
कोरोना वायरस को देश भर में फैलाने में तब्लीग जमात की गतिविधि का खुलासा होने के बाद असम का मूल मुसलमान अपने आप को इस संगठन व विचार धारा से अलग करने में लगा हुआ है। असम के मुसलमान यह कहते हैं कि तब्लीग जमात के लोगों को वैज्ञानिक विचार धारा का होना चाहिए। निजामुद्दीन मरकज में जिस तरह से इन लोगों द्वारा सरकार एवं प्रशासन की बातों को अनदेखा किया गया है उसने न केवल पूरे देश को खतरे में डाला है बल्कि सामूहिक रूप से मुस्लिम समुदाय को लज्जित किया है। राज्य के एक स्थानीय अखबार में छपी खबर के मुताबिक जोरहाट और डिब्ररूगढ़ जिले की अधिकांश मस्जिदों में तब्लीग जमात से जुड़े लोगों के प्रवेश को प्रतिबंधित किया गया है। इस संबंध में गुवाहाटी के कई स्थानीय मुस्लिम नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि जमात के लोगों को चाहिए कि वह आधुनिक बनें। विज्ञान को जानें और उसे समझें। साथ ही यह सभी लोग एक स्वर में कहते हैं कि तब्लीग जमात से जुड़े जिन लोगों ने नर्स और डाक्टरों पर थूका या दुव्र्यवहार किया है, उन सभी पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि फिर कोई इस तरह की जाहिल हरकत न करने पाए।
कटृटरपंथ फैलाते हैं जमाती
राज्य के धुबरी जिले के मुस्लिम मानते हैं कि तब्लीग जमात की ज्यादातर घुसपैठ बंगाली मुसलमानों के बीच है। लेकिन असम के जो मूल मुस्लिम हैं वह इनके फेर में उतनी जल्दी नहीं आते। यही कारण है कि निचले असम के इलाकों की मस्जिदों में तब्लीग जमात के प्रचार तक पर एक तरह से बंदिश लगाई गई है। जाहिर है कि असम के स्थानीय मुसलमान भी बांग्लादेशियों की घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे हैं। यही वजह है कि मुस्लिमों में एक बड़ा वर्ग है जो मानता है कि तब्लीग जमात के लोग राज्य के मुसलमानों के मनों में कट्टरपंथ का जहर घोलने में लगे हुए हैं।
स्थानीय मुस्लिम आज भी अपनाए हुए है मूल संस्कृति
असम का मूल मुसलमान आज भी असम के संस्कार-संस्कृति को अपनाए हुए है। वह समय-समय पर राज्य के तीज-त्योहार मनाता है। बिहू, दुर्गा पूजा एवं अन्य उत्सवों में उसकी अच्छी भागीदारी देखी जा सकती है। लेकिन तब्लीग जमात के लोगों ने स्थानीय मुसलमानों के मन में जहर घोलते हुए इन त्योहारों में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है और कटृटर इस्लामी तौर-तरीकों के साथ अरब की संस्कृति थोपने की कोशिशें उनके द्वारा लगातार की जा रही है। इसीलिए अब यहां की मुस्लिम महिलाएं बुर्का पहनती हैं, सिनेमा-संगीत से दूर रहती हैं।
तब्लीग जमात पर निगरानी की मांग
असम के मूल मुस्लिमों द्वारा संचालित संस्था गोरिया मोरिया देशी जातीय परिषद् मानती है कि राज्य सरकार को जमात के क्रियाकलापों को ध्यान में रखते हुए इसके जैसे अन्य संगठनों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। क्योंकि अभी तक जो स्पष्ट हुआ है उससे जाहिर होता है कि जमात स्थानीय युवाओं को कट्टरपंथी और अराजक गतिविधियों की ओर झोंकने में लगा हुआ है।
29 में से 28 कोरोना संक्रमित तब्लीगी जमात के
असम में 31 मार्च तक कोरोना का एक भी मरीज नहीं था। लेकिन उसके बाद से अब तक 29 मरीज सामने आ चुके हैं। हैरानी की बात है कि इन 29 में से 28 मरीज तब्लीग जमात से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश में भी जो एक व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया वह भी तब्लीग जमात का ही है।
मरकज कांड के बाद मूल असमिया मुसलमान तब्लीग जमात से न केवल आक्रोशित है बल्कि इससे जुड़े लोगों से दूरी बनाने लगा है। यही कारण है कि असम के कई इलाकों की मस्जिदों में इससे जुड़े लोगों के प्रवेश को प्रतिबंधित किया गया है
कोरोना वायरस को देश भर में फैलाने में तब्लीग जमात की गतिविधि का खुलासा होने के बाद असम का मूल मुसलमान अपने आप को इस संगठन व विचार धारा से अलग करने में लगा हुआ है। असम के मुसलमान यह कहते हैं कि तब्लीग जमात के लोगों को वैज्ञानिक विचार धारा का होना चाहिए। निजामुद्दीन मरकज में जिस तरह से इन लोगों द्वारा सरकार एवं प्रशासन की बातों को अनदेखा किया गया है उसने न केवल पूरे देश को खतरे में डाला है बल्कि सामूहिक रूप से मुस्लिम समुदाय को लज्जित किया है। राज्य के एक स्थानीय अखबार में छपी खबर के मुताबिक जोरहाट और डिब्ररूगढ़ जिले की अधिकांश मस्जिदों में तब्लीग जमात से जुड़े लोगों के प्रवेश को प्रतिबंधित किया गया है। इस संबंध में गुवाहाटी के कई स्थानीय मुस्लिम नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि जमात के लोगों को चाहिए कि वह आधुनिक बनें। विज्ञान को जानें और उसे समझें। साथ ही यह सभी लोग एक स्वर में कहते हैं कि तब्लीग जमात से जुड़े जिन लोगों ने नर्स और डाक्टरों पर थूका या दुव्र्यवहार किया है, उन सभी पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि फिर कोई इस तरह की जाहिल हरकत न करने पाए।
कटृटरपंथ फैलाते हैं जमाती
राज्य के धुबरी जिले के मुस्लिम मानते हैं कि तब्लीग जमात की ज्यादातर घुसपैठ बंगाली मुसलमानों के बीच है। लेकिन असम के जो मूल मुस्लिम हैं वह इनके फेर में उतनी जल्दी नहीं आते। यही कारण है कि निचले असम के इलाकों की मस्जिदों में तब्लीग जमात के प्रचार तक पर एक तरह से बंदिश लगाई गई है। जाहिर है कि असम के स्थानीय मुसलमान भी बांग्लादेशियों की घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे हैं। यही वजह है कि मुस्लिमों में एक बड़ा वर्ग है जो मानता है कि तब्लीग जमात के लोग राज्य के मुसलमानों के मनों में कट्टरपंथ का जहर घोलने में लगे हुए हैं।
स्थानीय मुस्लिम आज भी अपनाए हुए है मूल संस्कृति
असम का मूल मुसलमान आज भी असम के संस्कार-संस्कृति को अपनाए हुए है। वह समय-समय पर राज्य के तीज-त्योहार मनाता है। बिहू, दुर्गा पूजा एवं अन्य उत्सवों में उसकी अच्छी भागीदारी देखी जा सकती है। लेकिन तब्लीग जमात के लोगों ने स्थानीय मुसलमानों के मन में जहर घोलते हुए इन त्योहारों में शामिल होने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है और कटृटर इस्लामी तौर-तरीकों के साथ अरब की संस्कृति थोपने की कोशिशें उनके द्वारा लगातार की जा रही है। इसीलिए अब यहां की मुस्लिम महिलाएं बुर्का पहनती हैं, सिनेमा-संगीत से दूर रहती हैं।
तब्लीग जमात पर निगरानी की मांग
असम के मूल मुस्लिमों द्वारा संचालित संस्था गोरिया मोरिया देशी जातीय परिषद् मानती है कि राज्य सरकार को जमात के क्रियाकलापों को ध्यान में रखते हुए इसके जैसे अन्य संगठनों की गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। क्योंकि अभी तक जो स्पष्ट हुआ है उससे जाहिर होता है कि जमात स्थानीय युवाओं को कट्टरपंथी और अराजक गतिविधियों की ओर झोंकने में लगा हुआ है।
29 में से 28 कोरोना संक्रमित तब्लीगी जमात के
असम में 31 मार्च तक कोरोना का एक भी मरीज नहीं था। लेकिन उसके बाद से अब तक 29 मरीज सामने आ चुके हैं। हैरानी की बात है कि इन 29 में से 28 मरीज तब्लीग जमात से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश में भी जो एक व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया वह भी तब्लीग जमात का ही है।

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